रायपुर। राजस्थान की प्रसिद्ध आराध्य माजीसा माँ के 338वें जन्मोत्सव के अवसर पर क्षत्रिय करणी सेना ने श्रद्धालुओं को शुभकामनाएं दी हैं। करणी सेना के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं छत्तीसगढ़ प्रदेश अध्यक्ष वीरेंद्र सिंह तोमर ने माजीसा माँ को नमन करते हुए सभी भक्तों के सुख, शांति और समृद्धि की कामना की। उन्होंने छत्तीसगढ़ की उन्नति और प्रदेशवासियों के मंगल के लिए भी प्रार्थना की।
वीरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि माजीसा माँ के प्रति राजस्थान ही नहीं, बल्कि देश के विभिन्न हिस्सों और विदेशों में रहने वाले श्रद्धालुओं की भी गहरी आस्था है। जन्मोत्सव के अवसर पर उन्होंने माजीसा माँ के धाम के दर्शन के लिए रवाना हुए श्रद्धालुओं के दल की सुरक्षित यात्रा की कामना की। उन्होंने कहा कि श्रद्धालु आस्था और विश्वास के साथ धाम पहुंचकर मां का आशीर्वाद लें और सकुशल वापस लौटें।
तोमर ने माजीसा माँ के धाम के दर्शन करने की अपनी इच्छा भी व्यक्त की। उन्होंने प्रार्थना की कि माजीसा माँ की कृपा सभी श्रद्धालुओं पर बनी रहे और उनके जीवन में सुख-शांति, समृद्धि और खुशहाली आए।
स्वरूप कँवर के नाम से जुड़ी है माजीसा माँ की कथा
माजीसा माँ को राजस्थान में श्रद्धा के साथ कई नामों से पुकारा जाता है। उन्हें रानी भटियानी सा, स्वरूप कँवर बाईसा, भुआसा, भुआजी, मोतियाँवाली माँ और जसोल की धनियानी के नाम से भी जाना जाता है।
लोक मान्यता के अनुसार माजीसा माँ का मूल नाम स्वरूप कँवर था। उनका जन्म जैसलमेर जिले के जोगीदास गांव में भाद्रपद शुक्ल पक्ष की सप्तमी, विक्रम संवत 1745 में हुआ माना जाता है। इसी परंपरा के अनुसार उनका अवतरण दिवस 2 सितंबर 1688 को माना जाता है।
जैसलमेर से लगभग 85 किलोमीटर दूर स्थित जोगीदास गांव को आज जोगीदास धाम के नाम से जाना जाता है। माजीसा माँ से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं के चलते यह स्थान श्रद्धालुओं के लिए महत्वपूर्ण आस्था केंद्र माना जाता है।
भाटी राजवंश से जुड़ा जोगीदास गांव
माजीसा माँ की लोकगाथा में जोगीदास गांव के इतिहास का भी उल्लेख मिलता है। स्थानीय परंपरा के अनुसार जोगीदास का संबंध भाटी राजवंश से था। राजश्री खेतसिंह के वंश में पंचावण दास और फिर पृथ्वीराज हुए। पृथ्वीराज के पांच पुत्रों में जोगीदास सबसे बड़े बताए जाते हैं।
लोक इतिहास के अनुसार पृथ्वीराज को भाटीसरा क्षेत्र की जागीर मिली थी। बाद में जोगीदास ने विक्रम संवत 1741 में गांव की स्थापना की और वे इसके पहले जागीरदार माने गए। स्थानीय परंपराओं में गोगासर कुआं और राणासर तालाब के निर्माण का श्रेय भी जोगीदास को दिया जाता है।
कहा जाता है कि विवाह के बाद जोगीदास को लंबे समय तक संतान नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने भाटी वंश की कुलदेवी माँ स्वांगिया जी की आराधना की। लोक मान्यता के अनुसार इसके बाद विक्रम संवत 1745 में स्वरूप कँवर का जन्म हुआ और नौवें दिन उनका नामकरण किया गया।
जसोल में रानी भटियानी सा के रूप में मिली पहचान
समय के साथ स्वरूप कँवर का विवाह मालानी राज्य के जसोल के रावल कल्याण सिंह से हुआ। विवाह के बाद उन्हें रानी सा के रूप में सम्मान मिला। भाटी वंश से होने के कारण वे रानी भटियानी सा के नाम से प्रसिद्ध हुईं।
लोककथाओं के अनुसार स्वरूप कँवर से कल्याण सिंह को पुत्र लालसिंह हुआ। वहीं बड़ी रानी देवड़ी अणंदकँवर से प्रतापसिंह का जन्म हुआ। राजपरिवार से जुड़े घटनाक्रमों को लेकर कई लोककथाएं आज भी माजीसा माँ की कथा के साथ सुनाई जाती हैं।
प्रचलित कथा के अनुसार लालसिंह की असमय मृत्यु के बाद स्वरूप कँवर को गहरा आघात लगा। मान्यता है कि उन्होंने अन्न-जल त्याग दिया और 22 जनवरी 1719, माघ शुक्ल पक्ष द्वितीया के दिन अपने पुत्र को गोद में लेकर देह त्याग दी।
इस घटना के बाद स्वरूप कँवर को देवी स्वरूप मानकर पूजा किए जाने की परंपरा और मजबूत हुई। समय के साथ माजीसा माँ की आस्था राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों तक फैलती गई।
मंगणियार रामा से जुड़ी लोककथा
माजीसा माँ की लोक परंपरा में मंगणियार रामा की कथा का भी विशेष उल्लेख मिलता है। मान्यता के अनुसार रामा जसोल पहुंचे थे और स्वरूप कँवर से मिलने की इच्छा रखते थे। उनके देह त्याग की जानकारी मिलने के बाद वे कागा श्मशान घाट पहुंचे।
लोककथा के अनुसार वहां आराधना के दौरान उन्हें माजीसा माँ के दर्शन हुए। कथा में बताया जाता है कि माजीसा माँ ने रामा को कुछ वस्तुएं और मिश्री देकर अपने मायके में संदेश पहुंचाने को कहा।
रामा के जोगीदास पहुंचने के बाद परिवार को इस घटना की जानकारी दी गई। इसी कथा से जुड़े एक अन्य प्रसंग में भगवान दास नामक सुनार की आंखों की रोशनी लौटने की बात भी कही जाती है। ये सभी प्रसंग माजीसा माँ से जुड़ी धार्मिक लोक मान्यताओं का हिस्सा हैं।
लूणी नदी के किनारे मंदिर से जुड़ी मान्यता
माजीसा माँ के मंदिर और पूजा परंपरा को लेकर जसोल में भी कई लोककथाएं प्रचलित हैं। मान्यता के अनुसार रानी देवड़ी अणंदकँवर की तबीयत खराब होने के बाद रावल कल्याण सिंह ने स्वरूप कँवर की कृपा की कामना की थी।
रानी के स्वस्थ होने के बाद उन्होंने स्वरूप कँवर की स्मृति में मंदिर निर्माण का संकल्प लिया। लूणी नदी के किनारे स्थित यह स्थान माजीसा माँ की आराधना से जुड़े प्रमुख धार्मिक स्थलों में माना जाता है।
जोगीदास धाम में हुई मूर्ति स्थापना
जोगीदास गांव में माजीसा माँ की पूजा की परंपरा भी लंबे समय से चली आ रही है। स्थानीय मान्यता के अनुसार पहले यहां छोटे से थान पर पूजा-अर्चना होती थी। बाद में भाटी परिवार, वडेरा परिवार और दक्षिणी बसिया क्षेत्र के लोगों के सहयोग से मंदिर का निर्माण कराया गया।
23 अक्टूबर 1999 को विक्रम संवत 2056 के आसोज सुदी तेरस के दिन माँ स्वरूप कँवर और उनके पुत्र लालसिंह की मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा की गई। इसके बाद 13 अक्टूबर 2008 को विक्रम संवत 2065 के आसोज सुदी चौदस के दिन साँवाईसिंह की मूर्ति की भी प्राण प्रतिष्ठा हुई।
माजीसा माँ से जुड़ी स्थानीय मान्यताओं में क्षेत्र के जलस्रोतों का भी उल्लेख मिलता है। कुछ श्रद्धालु कुओं के पानी में बदलाव और जलस्तर बढ़ने जैसी घटनाओं को माजीसा माँ की कृपा से जोड़कर देखते हैं। ये बातें स्थानीय धार्मिक मान्यताओं और लोक परंपराओं पर आधारित हैं।
जन्मोत्सव पर श्रद्धालुओं ने मां से मांगा आशीर्वाद
माजीसा माँ का 338वां जन्मोत्सव श्रद्धालुओं के लिए विशेष धार्मिक अवसर है। राजस्थान के अलावा देश के विभिन्न राज्यों और विदेशों में रहने वाले भक्त भी इस अवसर पर माजीसा माँ का स्मरण कर सुख-शांति और समृद्धि की कामना कर रहे हैं।
इसी क्रम में क्षत्रिय करणी सेना के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं छत्तीसगढ़ प्रदेश अध्यक्ष वीरेंद्र सिंह तोमर ने माजीसा माँ को श्रद्धापूर्वक नमन किया। उन्होंने जन्मोत्सव की शुभकामनाएं देते हुए सभी भक्तों के मंगल की कामना की। साथ ही छत्तीसगढ़ की निरंतर प्रगति, प्रदेशवासियों की खुशहाली और माजीसा माँ के धाम जाने वाले श्रद्धालुओं की सुरक्षित एवं मंगलमय यात्रा के लिए प्रार्थना की।
