नई दिल्ली। प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रियों को पद से हटाने से जुड़े प्रस्तावित विधेयक पर गठित संयुक्त संसदीय समिति (JPC) ने अपनी रिपोर्ट अंतिम रूप दे दिया है। समिति ने कानून के संभावित दुरुपयोग को रोकने और संवैधानिक संतुलन बनाए रखने के उद्देश्य से कई अहम संशोधनों की सिफारिश की है। सबसे प्रमुख सुझाव यह है कि कोई भी प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री जेल में रहते हुए सरकार नहीं चला सकेगा, लेकिन यदि वह बाद में अदालत से बरी हो जाता है या अभियोजन पक्ष तय समय में कार्रवाई पूरी नहीं कर पाता, तो उसे दोबारा उसी पद पर बहाल किए जाने का प्रावधान रखा जाए।
केवल गंभीर मामलों में ही जाएगा पद
जेपीसी ने स्पष्ट किया है कि हर गिरफ्तारी या हिरासत के आधार पर पद नहीं जाएगा। समिति की सिफारिश के अनुसार, केवल उन मामलों में कार्रवाई होगी जिन अपराधों में पांच वर्ष या उससे अधिक की सजा का प्रावधान है। यदि ऐसे मामले में कोई प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री लगातार 30 दिनों तक न्यायिक हिरासत में रहता है, तो 31वें दिन उसे अपने पद से इस्तीफा देना होगा। यदि वह इस्तीफा नहीं देता, तो उसे स्वतः पद से हटाया हुआ माना जाएगा।
सांसद या विधायक की सदस्यता रहेगी बरकरार
समिति ने यह भी स्पष्ट किया है कि पद छोड़ने का अर्थ जनप्रतिनिधि की सदस्यता समाप्त होना नहीं होगा। प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री पद छोड़ने के बावजूद संबंधित व्यक्ति सांसद, विधायक या विधान परिषद का सदस्य बना रहेगा, जब तक कि जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत उसे अयोग्य घोषित नहीं किया जाता।
बरी होने पर फिर मिल सकेगा पद
जेपीसी ने अपनी रिपोर्ट में यह भी सिफारिश की है कि यदि संबंधित व्यक्ति अदालत से बरी हो जाता है, आरोप समाप्त हो जाते हैं या अभियोजन पक्ष निर्धारित समय में कार्रवाई पूरी नहीं कर पाता, तो उसे दोबारा प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री नियुक्त किया जा सकेगा। समिति का मानना है कि इससे निर्दोष व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा होगी और कानून के दुरुपयोग की आशंका भी कम होगी।
फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने की सिफारिश
समिति ने गंभीर मामलों की सुनवाई में देरी रोकने के लिए विशेष अदालतों या फास्ट ट्रैक कोर्ट गठित करने का सुझाव भी दिया है, ताकि ऐसे मामलों का शीघ्र निपटारा हो सके और लंबे समय तक संवैधानिक पद रिक्त न रहें।
संविधान में संशोधन का प्रस्ताव
जेपीसी ने अपनी रिपोर्ट में संविधान के अनुच्छेद 75, अनुच्छेद 164 और अनुच्छेद 239AA में संशोधन की सिफारिश की है। साथ ही इन प्रावधानों को जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019और पुडुचेरी केंद्र शासित प्रदेश अधिनियम, 1963 पर भी लागू करने का सुझाव दिया गया है।
समिति का कहना है कि प्रस्तावित संशोधन न तो आपराधिक न्याय प्रणाली के मूल सिद्धांतों में बदलाव करते हैं और न ही निर्दोष माने जाने के संवैधानिक अधिकार को प्रभावित करते हैं। साथ ही सांसदों और विधायकों की अयोग्यता से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों में भी कोई परिवर्तन प्रस्तावित नहीं किया गया है।
17 जुलाई को रिपोर्ट पर मुहर, मानसून सत्र में आ सकता है बिल
सूत्रों के अनुसार, जेपीसी 17 जुलाई की बैठक में अपनी रिपोर्ट को औपचारिक मंजूरी दे सकती है। इसके बाद संशोधित विधेयक को केंद्रीय मंत्रिमंडल के समक्ष रखा जाएगा। यदि कैबिनेट इसे मंजूरी देती है, तो सरकार 20 जुलाई से शुरू होने वाले संसद के मानसून सत्र में इसे पेश कर सकती है।
हालांकि, इस प्रस्तावित कानून का अधिकांश विपक्षी दल विरोध कर रहे हैं। विपक्ष का कहना है कि विधेयक के कुछ प्रावधानों पर व्यापक चर्चा और सहमति जरूरी है। वहीं, सरकार का मानना है कि यह कानून शासन की पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।
