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नेहरू से मोदी तक बदलीं सरकारें, लेकिन 70 साल तक चलता रहा जमीन विवाद… अब सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया ऐतिहासिक फैसला

नई दिल्ली: देश में जमीन से जुड़े मुकदमे वर्षों तक चलने के लिए बदनाम रहे हैं, लेकिन हरिद्वार की 15.5 बीघा जमीन का एक मामला इस धारणा को भी पीछे छोड़ देता है। यह विवाद इतना लंबा चला कि देश में पंडित जवाहरलाल नेहरू से लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक कई सरकारें बदल गईं, लेकिन फैसला अब जाकर आया है।

सुप्रीम कोर्ट ने करीब 70 साल पुराने जमीन विवाद का अंत करते हुए 4 जून 1957 की पंजीकृत सेल डीड को वैध करार दिया है। इस फैसले के साथ एक ही परिवार की चार पीढ़ियों से चली आ रही कानूनी लड़ाई समाप्त हो गई।न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया की पीठ ने हरिद्वार के नरसिपुर कलां गांव स्थित 15.5 बीघा भूमि से जुड़े इस विवाद में सराफत अली के पूर्वजों के पक्ष में फैसला सुनाया।

क्या था पूरा मामला?

विवाद की शुरुआत वर्ष 1957 में हुई थी, जब एक पंजीकृत सेल डीड के जरिए अपीलकर्ताओं के पूर्वजों ने यह जमीन खरीदी थी। उनका दावा था कि तब से वे लगातार जमीन पर कब्जे में हैं। वर्ष 1984 में जमीन का म्यूटेशन भी उनके पक्ष में हो गया और 1991 में चकबंदी के दौरान भूमिधर के अधिकार की मांग की गई।

शुरुआत में चकबंदी अधिकारी ने उनके पक्ष में फैसला दिया, लेकिन बाद में अन्य सह-भूस्वामियों की आपत्तियों के बाद मामला दोबारा खुला और 1999 में सेल डीड को अमान्य बताते हुए उनका दावा खारिज कर दिया गया। इसके बाद अपीलीय प्राधिकारी, पुनरीक्षण प्राधिकारी और 2017 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी उनके खिलाफ फैसला दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि 1957 की पंजीकृत सेल डीड को केवल गवाह के पते में मामूली अंतर जैसी तकनीकी वजहों से खारिज नहीं किया जा सकता।

अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रतिवादियों ने कभी यह आरोप नहीं लगाया कि बिक्री विलेख फर्जी था, धोखाधड़ी से तैयार किया गया था या दबाव में कराया गया था। ऐसे में कानून के अनुसार पंजीकृत बिक्री विलेख को वैध माना जाएगा।

पीठ ने यह भी कहा कि अपीलकर्ता लगातार जमीन पर अपने कब्जे का दावा करते रहे और प्रतिवादी इस दावे का प्रभावी खंडन नहीं कर सके।

क्यों खास है यह फैसला?

यह मामला केवल जमीन विवाद का नहीं, बल्कि भारतीय न्याय व्यवस्था में दशकों तक लंबित मामलों की एक मिसाल भी बन गया। जिस मुकदमे की शुरुआत 1957 में हुई थी, उसका फैसला उन न्यायाधीशों ने सुनाया जिनका जन्म भी उस समय नहीं हुआ था।

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