रांची: झारखंड की राजनीति में कांग्रेस का रुख एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। गठबंधन सरकार में अहम भागीदार होने के बावजूद पार्टी के कई नेता समय-समय पर सरकार और प्रशासन की कार्यशैली पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाते रहे हैं। ताजा घटनाक्रम ने इस बहस को और तेज कर दिया है कि आखिर कांग्रेस सरकार के साथ है या सरकार के फैसलों से असहमत।
इस पूरे विवाद की शुरुआत उस समय हुई थी, जब बड़कागांव के पूर्व विधायक योगेंद्र साव ने अपने आवास पर प्रशासन की कार्रवाई के बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और राज्य सरकार के खिलाफ सोशल मीडिया पर खुलकर नाराजगी जाहिर की थी। इसके बाद कांग्रेस ने अनुशासनहीनता का हवाला देते हुए उन्हें सात वर्षों के लिए पार्टी से निलंबित कर दिया था। उनकी बेटी और पूर्व विधायक अंबा प्रसाद ने भी प्रेस वार्ता कर प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल उठाए थे।
अब सात साल बाद कांग्रेस ने योगेंद्र साव का निलंबन समाप्त कर उन्हें दोबारा पार्टी में सक्रिय कर दिया है। राज्यसभा चुनाव के बाद हुई इस वापसी को राजनीतिक हलकों में कई मायनों में अहम माना जा रहा है। इसे कांग्रेस की बदलती रणनीति और संगठनात्मक मजबूती की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है।
इसी बीच बड़कागांव में आयोजित कांग्रेस के एसआईआर कार्यक्रम में राज्य के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने भी पुलिस प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा कि कांग्रेस नेताओं के घरों पर भारी पुलिस बल के साथ की गई कार्रवाई उचित नहीं थी। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक कार्यकर्ताओं के साथ इस तरह का व्यवहार नहीं होना चाहिए और भविष्य में ऐसी घटनाओं से बचना चाहिए।
कार्यक्रम में कांग्रेस के झारखंड प्रभारी के. राजू, प्रदेश अध्यक्ष केशव महतो कमलेश, योगेंद्र साव, अंबा प्रसाद समेत कई वरिष्ठ नेता मौजूद रहे। मंच से दिए गए बयानों ने एक बार फिर कांग्रेस की राजनीतिक भूमिका को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
विपक्ष ने इस पूरे घटनाक्रम को कांग्रेस की “दोहरी राजनीति” करार दिया है। विपक्ष का कहना है कि सत्ता में रहते हुए सरकार की आलोचना करना राजनीतिक अवसरवाद का उदाहरण है। यदि कांग्रेस सरकार की कार्यशैली से असंतुष्ट है तो उसे गठबंधन के भीतर अपनी बात रखनी चाहिए, न कि सार्वजनिक मंचों से सरकार पर सवाल उठाने चाहिए।
वहीं कांग्रेस का कहना है कि गठबंधन सरकार का हिस्सा होने का मतलब यह नहीं है कि वह जनहित के मुद्दों पर अपनी आवाज़ उठाना छोड़ दे। पार्टी का दावा है कि जनता से जुड़े मामलों में वह हमेशा खुलकर अपनी बात रखेगी और गलत कार्रवाई का विरोध करती रहेगी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस का यह रुख उसे एक ओर अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाए रखने का अवसर देता है, लेकिन दूसरी ओर इससे गठबंधन सरकार की कार्यशैली और समन्वय पर भी सवाल खड़े होते हैं। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कांग्रेस का यह रवैया महागठबंधन की राजनीति और राज्य की सियासी दिशा पर क्या प्रभाव डालता है।
