नई दिल्ली: जंतर-मंतर पर हुए छात्र प्रदर्शन मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अहम आदेश जारी करते हुए कहा है कि 18 वर्ष से कम उम्र के सभी छात्रों को तत्काल रिहा किया जाए और किसी भी प्रदर्शनकारी छात्र के खिलाफ फिलहाल कोई दंडात्मक कार्रवाई न की जाए। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि जिन लोगों का आपराधिक इतिहास है, उन्हें इस राहत का लाभ नहीं मिलेगा।चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण प्रदर्शन नागरिकों का अधिकार है, लेकिन यदि कहीं अत्यधिक बल प्रयोग या कानून का उल्लंघन हुआ है तो उसकी स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी जांच होनी चाहिए। अदालत ने कहा कि दोषी चाहे कोई भी हो, उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।
सबूत सुरक्षित रखने के निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और सात राज्यों को नोटिस जारी करते हुए प्रदर्शन से जुड़े सभी CCTV फुटेज, ड्रोन रिकॉर्डिंग, वायरलेस संचार और अन्य डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित रखने के निर्देश दिए हैं। साथ ही अदालत ने कहा कि प्रदर्शनकारी छात्रों का डिजिटल डेटा और व्यक्तिगत जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाएगी।
हाई लेवल जांच समिति बनेगी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि मामले की निष्पक्ष जांच के लिए एक उच्च स्तरीय जांच समिति (High-Level Committee) का गठन किया जाएगा। अदालत ने कहा कि सरकारों का पक्ष सुनने के बाद समिति की रूपरेखा तय की जाएगी।
पेलेट गन और बल प्रयोग पर उठे सवाल
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से आरोप लगाया गया कि प्रदर्शन के दौरान पेलेट गन, इलेक्ट्रिक बैटन और कीलों वाली लाठियों का इस्तेमाल किया गया। अदालत को बताया गया कि एक 19 वर्षीय युवक की आंखों की रोशनी चली गई, एक युवती ICU में भर्ती हुई और एक महिला प्रदर्शनकारी को कथित तौर पर बिना उकसावे के थप्पड़ मारा गया। एक मीडियाकर्मी पर हमले का मामला भी कोर्ट के सामने रखा गया।
सरकार का पक्ष
केंद्र और दिल्ली सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सरकार छात्रों के खिलाफ बल प्रयोग को हल्के में नहीं ले रही है, लेकिन प्रदर्शन के दौरान करीब 250 पुलिसकर्मी भी घायल हुए हैं। उन्होंने दावा किया कि प्रदर्शन में कुछ असामाजिक तत्व भी शामिल थे, जिनका आपराधिक रिकॉर्ड है। इस पर चीफ जस्टिस ने कहा कि सच्चाई सामने लाने के लिए निष्पक्ष जांच आवश्यक है।
बिहार में नाबालिगों की हिरासत का मुद्दा भी उठा
सुनवाई के दौरान बिहार में हिरासत में लिए गए नाबालिग छात्रों का मुद्दा भी उठा। याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि 150 से अधिक नाबालिग अब भी कस्टडी में हैं, जिनमें एक 13 वर्षीय छात्र भी शामिल है। अदालत से उन्हें तत्काल रिहा करने की मांग की गई।
सुप्रीम कोर्ट का संदेश
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में विरोध-प्रदर्शन का अधिकार सुरक्षित है, लेकिन किसी भी पक्ष द्वारा कानून का उल्लंघन स्वीकार्य नहीं है। अदालत ने कहा कि जिम्मेदारी तय करना और निष्पक्ष जांच कराना न्याय के हित में बेहद जरूरी है।
