एक मोबाइल फोन… जो हमेशा सिरहाने रखा रहता था। हर बार उसकी घंटी बजती तो दिल में उम्मीद जागती कि शायद इस बार किसी बेटी का फोन होगा और दूसरी तरफ से आवाज आएगी—”पापा, कैसे हो?” लेकिन यह इंतजार आखिर तक इंतजार ही रह गया।
हरियाणा के सोनीपत स्थित एक वृद्ध आश्रम में रहने वाले शिवचरण रामरतन गुप्ता ने अपनी जिंदगी के आखिरी पल इसी उम्मीद में बिताए कि उनकी बेटियां उनसे बात करेंगी। आश्रम प्रबंधन के अनुसार, उनकी तबीयत बिगड़ने पर तीनों बेटियों को कई बार सूचना दी गई, लेकिन कोई भी उनसे मिलने नहीं पहुंचा।
बेटियों की पढ़ाई-लिखाई के लिए खपा दी पूरी जिंदगी
मुंबई निवासी शिवचरण रामरतन गुप्ता कभी कपड़े के सफल कारोबारी थे। परिवार की खुशहाली और बेटियों के बेहतर भविष्य के लिए उन्होंने जीवनभर मेहनत की। बेटियों की शिक्षा और परवरिश में कोई कमी नहीं छोड़ी, लेकिन उम्र के अंतिम पड़ाव पर उन्हें अपनों का साथ नसीब नहीं हुआ।
बीमारी बढ़ी, इंतजार भी बढ़ता गया
करीब 20 दिन पहले उनकी तबीयत गंभीर रूप से बिगड़ने लगी। वृद्ध आश्रम के संचालकों ने बार-बार परिवार से संपर्क किया, लेकिन इंतजार खत्म नहीं हुआ। शिवचरण की नजरें आखिरी समय तक मोबाइल फोन पर टिकी रहीं।
मौत के बाद भी दे गए जिंदगी का संदेश
शिवचरण की कहानी सिर्फ अकेलेपन की नहीं, बल्कि मानवता की भी मिसाल है। उन्होंने मृत्यु के बाद अपनी आंखें दान करने का निर्णय लिया था। उनकी इच्छा पूरी की गई और अब उनकी आंखें किसी जरूरतमंद की दुनिया रोशन करेंगी।
समाज के लिए बड़ा सवाल
शिवचरण की जिंदगी एक ऐसा सवाल छोड़ गई है, जिस पर हर परिवार को सोचने की जरूरत है। जिन माता-पिता ने अपने बच्चों के भविष्य के लिए पूरी जिंदगी समर्पित कर दी, क्या उनके बुढ़ापे में कुछ पल साथ बिताना भी हमारी जिम्मेदारी नहीं है?
शिवचरण भले ही इस दुनिया से चले गए, लेकिन उनका नेत्रदान यह संदेश दे गया कि इंसान अपने जाने के बाद भी किसी की जिंदगी में उजाला बन सकता है। वहीं, उनकी अधूरी इच्छा—”पापा, कैसे हो?”—आज भी हर संवेदनशील दिल को झकझोर देती है।
