नई दिल्ली / चंडीगढ़ पंजाब विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस आलाकमान ने अपनी कमर कस ली है। सूबे के सियासी दिग्गजों को पार्टी में अहम जिम्मेदारियां सौंपी जा रही हैं, लेकिन इस बीच एक बड़े फैसले ने राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। तीन बार के सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी को पंजाब कांग्रेस के हालिया संगठनात्मक पुनर्गठन में पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया है। पार्टी की इस बेरुखी पर अब मनीष तिवारी का दर्द सरेआम छलक उठा है।
मनीष तिवारी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पहले ट्विटर) पर अपनी उपेक्षा से जुड़ी एक खबर साझा करते हुए अपनी ही पार्टी के नेताओं और संस्थाओं पर तंज कसा है।
‘असुरक्षा का काश कोई एंटीडोट होता’
मनीष तिवारी ने अपने पोस्ट में लिखा:
इसके आगे उन्होंने पार्टी के प्रति अपनी निष्ठा जाहिर करते हुए लिखा, “इसके बावजूद, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने मुझे पिछले 45 वर्षों में बहुत कुछ दिया है और मैंने भी अपने पूरे वयस्क जीवन को दशकों तक पार्टी की सेवा में समर्पित किया है।” उन्होंने आगे एक गंभीर टिप्पणी करते हुए यह भी कहा कि “जो होना है, वह होकर रहेगा।”
क्यों नाराज हैं मनीष तिवारी? (विवाद की मुख्य वजह)
दरअसल, पंजाब विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस ने राज्य इकाई के नेतृत्व को लेकर चल रही अटकलों पर विराम लगा दिया है। आलाकमान ने जो नई नियुक्तियां और समितियां बनाई हैं, उनमें मनीष तिवारी को कोई जगह नहीं दी गई है।
पार्टी के बड़े फैसले इस प्रकार हैं:
- अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष: प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग और विधायक दल के नेता प्रताप सिंह बाजवा अपने पदों पर बने रहेंगे।
- चरणजीत सिंह चन्नी: पूर्व मुख्यमंत्री और पार्टी के दलित चेहरे को ‘चुनाव अभियान समिति’ का प्रमुख बनाया गया है।
- सुखजिंदर रंधावा: लोकसभा सदस्य रंधावा को ‘कोर कमेटी’ की कमान सौंपी गई है।
- विजय इंदर सिंघला: पूर्व मंत्री को ‘चुनाव प्रबंधन और समन्वय समिति’ का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है।
- अमर सिंह: सांसद अमर सिंह को ‘घोषणापत्र समिति’ का जिम्मा मिला है।
कद्दावर नेता की अनदेखी से उठे सवाल
चंडीगढ़ से मौजूदा लोकसभा सांसद, जाने-माने वकील और भारत सरकार के पूर्व सूचना एवं प्रसारण मंत्री रहे मनीष तिवारी की गिनती कांग्रेस के सबसे पढ़े-लिखे और गंभीर नेताओं में होती है। पंजाब की राजनीति में उनका एक बड़ा कद है। ऐसे में चुनाव से ठीक पहले इतने बड़े चेहरे को किसी भी समिति में शामिल न करना, कांग्रेस के भीतर गुटबाजी और अंदरूनी ‘असुरक्षा’ की ओर इशारा कर रहा है, जिसका जिक्र खुद तिवारी ने अपने पोस्ट में किया है।
अब देखना दिलचस्प होगा कि मनीष तिवारी का यह ‘दर्द’ आने वाले दिनों में पंजाब कांग्रेस की अंदरूनी सियासत में क्या नया मोड़ लेकर आता है।
