बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बिजली ट्रांसमिशन लाइन और बिजली टावर निर्माण से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि सार्वजनिक हित में ट्रांसमिशन लाइन बिछाने या बिजली टावर लगाने के लिए जमीन मालिक की पूर्व अनुमति लेना जरूरी नहीं है। हालांकि, प्रभावित जमीन मालिक को नियमों के तहत उचित मुआवजा देना अनिवार्य होगा।
यह फैसला न्यायमूर्ति अमितेन्द्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने रायपुर निवासी आदित्येंद्र शुक्ला की फर्म ए.एस. एसोसिएट्स द्वारा दायर याचिका पर सुनाया। याचिका में जमीन पर लगाए गए बिजली टावर को हटाने, विभाग से हटाने का खर्च दिलाने तथा कथित अवैध उपयोग के लिए 5 लाख रुपये मुआवजे की मांग की गई थी।
राष्ट्रीय महत्व का कार्य है बिजली पारेषण
सुनवाई के दौरान बिजली कंपनी की ओर से दलील दी गई कि यह मुद्दा पहले ही हाईकोर्ट के ‘जयकुमार अग्रवाल बनाम छत्तीसगढ़ राज्य’ मामले में तय हो चुका है, जिसे डिवीजन बेंच भी बरकरार रख चुकी है। अदालत ने उसी फैसले का हवाला देते हुए कहा कि बिजली पारेषण देश के विकास और जनहित से जुड़ा राष्ट्रीय महत्व का कार्य है। छत्तीसगढ़ देश का प्रमुख पावर हब है और यहां से कई राज्यों को बिजली की आपूर्ति की जाती है।
कोर्ट ने कहा कि ऐसे विकास कार्यों के लिए संबंधित अधिकारियों को जमीन मालिक से पूर्व अनुमति या नोटिस लेने की आवश्यकता नहीं है।
मालिकाना हक रहेगा सुरक्षित
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बिजली टावर लगाए जाने से संबंधित कंपनी या विभाग को जमीन का मालिकाना हक नहीं मिलेगा। जमीन का स्वामित्व पूरी तरह जमीन मालिक के पास ही रहेगा। कंपनी केवल टावर और उससे जुड़े सीमित हिस्से का उपयोग कर सकेगी।
60 दिनों में मुआवजा देने के निर्देश
अदालत ने निर्देश दिया कि टावर निर्माण से हुए नुकसान का आकलन कर प्रभावित जमीन मालिक को नियमानुसार उचित मुआवजा दिया जाए। संबंधित अधिकारियों को आदेश की प्रति प्राप्त होने के 60 दिनों के भीतर सुनवाई कर मुआवजा राशि का भुगतान सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।
साथ ही अदालत ने याचिकाकर्ता को भी निर्देशित किया कि वह बिजली टावर के संचालन और ट्रांसमिशन लाइन से जुड़े कार्यों में किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न न करे।
फैसले की प्रमुख बातें
- बिजली टावर लगाने के लिए जमीन मालिक की पूर्व अनुमति आवश्यक नहीं।
- सार्वजनिक हित और राष्ट्रीय महत्व के कार्यों को प्राथमिकता।
- जमीन का मालिकाना हक जमीन मालिक के पास ही रहेगा।
- प्रभावित व्यक्ति को नियमानुसार उचित मुआवजा मिलेगा।
- 60 दिनों के भीतर मुआवजा भुगतान सुनिश्चित करने के निर्देश।
- जमीन मालिक केवल अनुमति न लेने के आधार पर निर्माण कार्य नहीं रुकवा सकता।
