नई दिल्ली, 1 जुलाई। तमिलनाडु की विजय सरकार ने राज्य में गायों और बछड़ों के वध (गोहत्या) पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने संबंधी मद्रास हाई कोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। सरकार का कहना है कि हाई कोर्ट का फैसला राज्य के प्रचलित कानूनों और वैधानिक प्रावधानों के अनुरूप नहीं है तथा अदालत अपने आदेश में मूल याचिका की मांग से आगे बढ़ गई।
सरकार की ओर से दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) में कहा गया है कि तमिलनाडु एनिमल प्रिजर्वेशन एक्ट, 1958 के तहत कुछ विशेष परिस्थितियों में गायों के वध की अनुमति दी जा सकती है। कानून के अनुसार यदि कोई गाय 10 वर्ष से अधिक आयु की हो, काम करने या प्रजनन के योग्य न हो और सक्षम अधिकारी से प्रमाणपत्र प्राप्त हो, तो उसके वध की अनुमति दी जा सकती है। ऐसे में हाई कोर्ट द्वारा पूर्ण प्रतिबंध लगाने का निर्देश राज्य के मौजूदा कानून के विपरीत है।
- क्या था मद्रास हाई कोर्ट का आदेश?
मामला 27 मई का है, जब बकरीद से एक दिन पहले दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए मद्रास हाई कोर्ट की खंडपीठ ने राज्य सरकार के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिया था कि तमिलनाडु में किसी भी स्थान पर किसी भी दिन गाय या बछड़े का वध न होने दिया जाए। अदालत ने यह भी कहा था कि कानून का सख्ती से पालन कराया जाए और संबंधित अधिकारियों को आवश्यक निर्देश जारी किए जाएं।
- मूल याचिका में क्या मांग की गई थी?
याचिका हिंदू मक्कल काची के पदाधिकारी द्वारा दायर की गई थी। इसमें मुख्य मांग यह थी कि बकरीद के दौरान या अन्य अवसरों पर पशुओं का वध केवल अधिकृत और निर्धारित स्लॉटरहाउस में ही कराया जाए तथा सार्वजनिक स्थानों पर किसी भी प्रकार का अवैध वध न होने दिया जाए। राज्य सरकार का कहना है कि याचिका की मांग सीमित थी, लेकिन हाई कोर्ट ने उससे आगे बढ़कर पूरे राज्य में गायों और बछड़ों के वध पर पूर्ण प्रतिबंध का आदेश दे दिया।
- सरकार की प्रमुख दलीलें
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में तमिलनाडु सरकार ने कहा है कि हाई कोर्ट का आदेश केवल तमिलनाडु एनिमल प्रिजर्वेशन एक्ट, 1958 ही नहीं, बल्कि प्रिवेंशन ऑफ क्रुएल्टी टू एनिमल्स एक्ट, 1960, स्लॉटर हाउस नियम, 2001 तथा अन्य राज्य कानूनों की व्यवस्था के भी विपरीत है। इन कानूनों में पशु वध को पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं किया गया है, बल्कि निर्धारित शर्तों और अधिकृत स्थानों पर इसकी अनुमति दी गई है।
सरकार ने यह भी तर्क दिया है कि न्यायालय कानून की व्याख्या कर सकता है, लेकिन यदि किसी विषय पर स्पष्ट वैधानिक प्रावधान मौजूद हैं तो अदालत उनके विपरीत नया कानूनी ढांचा नहीं बना सकती। याचिका में कहा गया है कि हाई कोर्ट का आदेश न्यायिक सीमा से आगे बढ़ता हुआ प्रतीत होता है।
- अब सुप्रीम कोर्ट में होगी सुनवाई
तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगाने और मामले की शीघ्र सुनवाई की मांग की है। यह मामला केवल गोहत्या पर प्रतिबंध तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसमें न्यायिक आदेशों की सीमा, राज्य के वैधानिक अधिकारों और मौजूदा कानूनों की व्याख्या जैसे महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न भी जुड़े हुए हैं। अब इस पूरे विवाद पर अंतिम फैसला सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद ही सामने आएगा।
