मुंबई/नई दिल्ली: महाराष्ट्र की सियासत में एक बार फिर बड़े फेरबदल के संकेत मिल रहे हैं। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP-SP) के प्रमुख और देश के सबसे अनुभवी राजनेताओं में से एक, शरद पवार की पार्टी पर इस समय वैसा ही संकट मंडरा रहा है, जैसा हाल के दिनों में उद्धव ठाकरे की शिवसेना और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की टीएमसी झेल चुकी हैं। विधानसभा चुनावों के नतीजों के बाद क्षेत्रीय क्षत्रपों पर बढ़ते दबाव के बीच अब यह सवाल बड़ा हो गया है कि शरद पवार अपनी बची हुई राजनीतिक पूंजी को बचाने के लिए क्या कदम उठाएंगे?
1. कांग्रेस में विलय (Merger): सबसे बड़ा और चर्चित विकल्प
राजनीतिक गलियारों में इस बात की सबसे ज्यादा चर्चा है कि शरद पवार अपनी पार्टी NCP (SP) का कांग्रेस में विलय कर सकते हैं।
- पुरानी कोशिशें: रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2024 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से पहले भी दोनों पार्टियों के विलय की संभावनाएं तलाशी जा रही थीं, लेकिन चुनावी व्यस्तताओं के कारण बात आगे नहीं बढ़ सकी।
- सुप्रिया सुले का रुख: हालांकि, इस मुद्दे पर शरद पवार की बेटी और सांसद सुप्रिया सुले का कहना है कि कांग्रेस पिछले 25 सालों से उनकी मित्र पार्टी रही है, लेकिन फिलहाल विलय को लेकर न तो कांग्रेस की तरफ से और न ही NCP (SP) की तरफ से कोई आधिकारिक प्रस्ताव आया है।
2. ममता बनर्जी और उद्धव ठाकरे जैसी ही चुनौतियां
इस रिपोर्ट के विश्लेषण के अनुसार, मौजूदा राजनीतिक माहौल में विपक्षी गठबंधन (INDIA) के कई दल दबाव में हैं:
- विधानसभा चुनावों के नतीजों का सबसे बुरा असर ममता बनर्जी और उद्धव ठाकरे की राजनीति पर देखने को मिला है। एमके स्टालिन की पार्टी भी इससे अछूती नहीं है।
- ऐसे में शरद पवार और ममता बनर्जी भले ही पूरी तरह एक नाव में न हों, लेकिन दोनों के सामने अपनी पार्टी और सांसदों को एकजुट रखने की समान चुनौती है। शरद पवार के किसी भी बड़े फैसले का असर विपक्षी खेमे के अन्य क्षेत्रीय दलों पर भी पड़ना तय है।
3. ‘फूंक-फूंक कर कदम’ रख रहा है पवार परिवार
पार्टी में पहले हो चुकी बड़ी बगावत (अजीत पवार गुट का अलग होना) के बाद, शरद पवार और उनका परिवार अब बेहद सतर्क है। सांसदों और विधायकों के पाला बदलने की संभावनाओं को देखते हुए पवार परिवार और उनके सलाहकार हर कदम बेहद सोच-समझकर उठा रहे हैं।
आगे क्या?
शरद पवार राजनीति के एक ऐसे खिलाड़ी हैं जो कभी भी हार नहीं मानते और आखिरी वक्त तक अपनी रणनीति नहीं खोलते। अब देखना यह होगा कि वह कांग्रेस के साथ विलय का रास्ता चुनते हैं, विपक्षी एकजुटता के सहारे अपनी अलग पहचान बनाए रखते हैं या फिर कोई नया चौंकाने वाला स्टैंड लेते हैं। महाराष्ट्र की जनता और देश के राजनीतिक विश्लेषकों की नजरें अब पवार के अगले कदम पर टिकी हैं।
